यूपी 2027: अखिलेश का 'दलित दांव' और लखनऊ की गद्दी का महासंग्राम
ग्लोबल हिंदी न्यूज़
उत्तर प्रदेश की राजनीति का एक पुराना और अकाट्य नियम रहा है'जिसने लखनऊ जीता, उसने दिल्ली का रास्ता नाप लिया।' 80 लोकसभा सीटों वाले इस सूबे की अहमियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि देश की सत्ता का भविष्य हमेशा यहीं से तय होता है। इसी पृष्ठभूमि में, साल 2027 में होने वाला उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव सिर्फ एक सूबे की सत्ता का मुकाबला नहीं है, बल्कि यह देश की अगली राजनीतिक करवट का मुख्य केंद्र बनने जा रहा है। 10 साल से सत्ता के वनवास में बैठे समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव इस बार किसी भी तरह की चूक के मूड में नहीं हैं। उन्होंने बिसात पर एक ऐसी चाल चली है, जिसने प्रतिद्वंद्वियों के खेमे में खलबली मचा दी है। यह चाल हैसामान्य यानी अनारक्षित सीटों पर अनुसूचित जाति (दलित) के मजबूत चेहरों को चुनावी मैदान में उतारना। यह कोई आनन-फानन में लिया गया भावुक फैसला नहीं, बल्कि आंकड़ों की गहरी चीर-फाड़ और जमीन से निकली हुई एक सोची-समझी सोशल इंजीनियरिंग है।
इस नए फॉर्मूले की बुनियाद साल 2024 के लोकसभा चुनाव में ही रख दी गई थी, जब सपा ने पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) का नारा बुलंद किया था। उस चुनाव में इस प्रयोग के जो नतीजे आए, उन्होंने देश के बड़े-बड़े राजनीतिक विश्लेषकों को चौंका दिया। अयोध्या की ऐतिहासिक धरती पर, जहां राम मंदिर निर्माण को सत्ताधारी दल की सबसे बड़ी ताकत माना जा रहा था, वहां की फैजाबाद सामान्य लोकसभा सीट पर अखिलेश यादव ने नौ बार के विधायक और दलित नेता अवधेश प्रसाद को टिकट देकर सबको हैरान कर दिया था। जब नतीजे आए, तो अवधेश प्रसाद ने भाजपा के दिग्गज उम्मीदवार को 54,567 मतों के भारी अंतर से शिकस्त देकर देश की राजनीति में एक नया इतिहास लिख दिया। इसी तरह, पश्चिम उत्तर प्रदेश की मेरठ सामान्य सीट पर सपा की दलित उम्मीदवार सुनीता वर्मा ने भाजपा के कद्दावर चेहरे को नाकों चने चबवा दिए। भले ही वहां जीत का अंतर महज 10,585 वोटों का रहा, लेकिन उस लोकसभा क्षेत्र के तहत आने वाली पांच विधानसभा सीटों में से चार पर सपा ने भारी बढ़त हासिल की थी।
इन आंकड़ों ने सपा के हौसले को सातवें आसमान पर पहुंचा दिया है। अगर अतीत पर नजर डालें, तो साल 2019 के लोकसभा चुनाव में जब सपा और बसपा का गठबंधन था, तब सपा महज 5 सीटों पर सिमट गई थी। लेकिन 2024 में अकेले अपने दम पर और कांग्रेस के साथ 'इंडिया' गठबंधन के तहत सपा ने 37 सीटें जीतकर एक नया कीर्तिमान स्थापित किया। सबसे महत्वपूर्ण आंकड़ा यह है कि इस लोकसभा चुनाव के दौरान उत्तर प्रदेश की कुल 403 विधानसभा सीटों में से 184 सीटों पर समाजवादी पार्टी ने निर्णायक बढ़त बनाई थी। उत्तर प्रदेश में सरकार बनाने के लिए बहुमत का जादुई आंकड़ा 202 है। वर्तमान में सपा के पास विधानसभा में 102 विधायक हैं। पार्टी रणनीतिकारों का गणित कहता है कि यदि इस बढ़त को थोड़ा और विस्तार दे दिया जाए, तो 202 का आंकड़ा छूना बेहद आसान हो जाएगा। सूबे में कुल 84 सीटें अनुसूचित जाति (एससी) और 2 सीटें अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए आरक्षित हैं। सपा की योजना इन 86 आरक्षित सीटों पर पूरी ताकत झोंकने के साथ-साथ कम से कम दो दर्जन सामान्य सीटों पर भी दलित उम्मीदवार उतारकर पूरे सामाजिक ताने-बाने को अपने पक्ष में मोड़ने की है।
सपा के रणनीतिकारों ने इस बार अपनी रणनीति के लिए सबसे पहले पश्चिम उत्तर प्रदेश की धरती को चुना है। इसके पीछे दो बेहद ठोस राजनीतिक कारण हैं। पहला कारण बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के जनाधार में आई भारी गिरावट है। साल 2012 के बाद से पश्चिम यूपी में बसपा का पारंपरिक दलित वोट बैंक लगातार बिखरा है। जो जाटव और गैर-जाटव दलित मतदाता कभी मायावती की सबसे बड़ी ताकत हुआ करते थे, वे आज के दौर में नए राजनीतिक विकल्प की तलाश में हैं। सपा इसी बिखराव को समेटकर अपने पाले में लाना चाहती है। दूसरा और सबसे बड़ा कारण है आजाद समाज पार्टी के प्रमुख चंद्रशेखर आजाद का तेजी से होता उभार। लोकसभा चुनाव में नगीना सीट से बंपर जीत दर्ज करने के बाद चंद्रशेखर आजाद पश्चिम यूपी के दलित युवाओं के बीच एक मजबूत प्रतीक बनकर उभरे हैं। अखिलेश यादव इस बात को अच्छी तरह भांप चुके हैं कि अगर चंद्रशेखर का यह नया दलित नेतृत्व जमीन पर मजबूत हो गया, तो भविष्य में सपा के 'पीडीए' की इमारत दरक सकती है। यही वजह है कि सामान्य सीटों पर खुद दलित चेहरों को आगे बढ़ाकर सपा यह संदेश देने की कोशिश में है कि दलित समाज का असली राजनीतिक और व्यावहारिक हितैषी कौन है।
इस बार सपा में टिकट बंटवारे का ढर्रा पुराने तौर-तरीकों से बिल्कुल अलग होने जा रहा है। अब न तो किसी बड़े नेता की पैरवी चलेगी और न ही परिवारवाद का सिक्का। अखिलेश यादव का पूरा ध्यान केवल और केवल 'विनेबिलिटी' यानी उम्मीदवार की जीत की क्षमता पर है। सूत्रों के मुताबिक, पार्टी के 102 मौजूदा विधायकों में से अधिकांश को दोबारा टिकट मिलना लगभग तय है, लेकिन इसके लिए भी जमीन पर उनका रिपोर्ट कार्ड सकारात्मक होना अनिवार्य है। इस काम को बेहद पेशेवर तरीके से अंजाम देने के लिए उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव और रिटायर्ड आईएएस अधिकारी आलोक रंजन की अध्यक्षता में एक विशेष आंतरिक सर्वे कमेटी का गठन किया गया है। यह कमेटी हर एक विधानसभा क्षेत्र का बारीकी से मूल्यांकन कर रही है। जिला स्तर पर सामूहिक सहमति और जमीनी सर्वे से आने वाले आंकड़ों के आधार पर ही इस बार उम्मीदवारों के नाम पर अंतिम मुहर लगेगी।
इस पूरे ताने-बाने के बीच कांग्रेस के साथ सीट शेयरिंग का मसला बेहद पेचीदा मोड़ पर है। साल 2024 की सफलता से उत्साहित कांग्रेस आगामी 2027 के चुनाव में सूबे की करीब 100 सीटों पर अपनी दावेदारी ठोकने की तैयारी में है। हालांकि, समाजवादी पार्टी का आंतरिक विश्लेषण कहता है कि कांग्रेस को 70 से 75 से अधिक सीटें देना आत्मघाती साबित हो सकता है। खासकर सहारनपुर, मुरादाबाद और अमरोहा जैसी मुस्लिम बहुल सीटों पर दोनों दलों के बीच खींचतान होना बिल्कुल तय माना जा रहा है। इन क्षेत्रों में जहां कांग्रेस अपने पुराने रसूख की दुहाई दे रही है, वहीं सपा अपनी जमीनी मजबूती का दावा कर रही है। अखिलेश यादव जहां एक तरफ कांग्रेस से एक निश्चित राजनीतिक दूरी बनाकर अपनी स्वतंत्र जमीन को पुख्ता कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस भी अंदरखाने बसपा के खिसके हुए दलित वोट बैंक को सीधे अपने पाले में लाने की जुगत में लगी है।
यह रणनीति कागजों पर जितनी आकर्षक और अचूक नजर आती है, जमीन पर इसकी राह उतनी ही पथरीली और चुनौतियों से भरी है। मुस्लिम, अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) और दलित समाज को एक ही राजनीतिक मंच पर लंबे समय तक एकजुट रखना और साथ ही कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टी की आकांक्षाओं को संतुष्ट करना, एक बेहद ही जोखिम भरा दांव है। उधर, चंद्रशेखर आजाद अपनी अलग राह पर चलने के लिए हुंकार भर रहे हैं, तो दूसरी तरफ बसपा किसी भी गठबंधन से दूरी बनाकर अपने खोए हुए गढ़ को बचाने के लिए साइलेंट मोड में काम कर रही है। इन सबके बीच, सबसे बड़ी चुनौती सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी है, जिसके पास न केवल एक मजबूत और कैडर-बेस्ड संगठन है, बल्कि सत्ता की ताकत और असीमित संसाधन भी मौजूद हैं। सत्ताधारी दल भी विपक्ष के इस 'पीडीए' चक्रव्यूह को तोड़ने के लिए गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलितों के बीच अपनी पैठ को और गहरा करने में जुट गया है। बहरहाल, सियासी बिसात बिछ चुकी है और मोहरे अपनी-अपनी चालें चल रहे हैं। अब देखना यह होगा कि साल 2027 के इस महासंग्राम में अखिलेश यादव का यह 'दलित दांव' उत्तर प्रदेश की राजनीति में बदलाव की नई इबारत लिखता है, या फिर विरोधियों के चक्रव्यूह में उलझकर रह जाता है। लखनऊ की गद्दी का अंतिम फैसला भले ही वक्त के गर्भ में हो, लेकिन शह और मात का खेल अभी से अपने चरम पर पहुंच गया है।
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