यूपी विधानसभा चुनाव 2027: सपा के अभेद्य दुर्ग में ओवैसी की हुंकार, बदलेगा सियासी समीकरण?

यूपी विधानसभा चुनाव 2027: बहराइच की मटेरा सीट से असदुद्दीन ओवैसी ने चुनावी शंखनाद कर उत्तर प्रदेश की सियासत में हलचल मचा दी है। सपा के इस अभेद्य मुस्लिम बहुल दुर्ग में सेंधमारी और बसपा के साथ संभावित 40% के दलित-मुस्लिम समीकरण वाले इस मास्टरस्ट्रोक ने सियासी दिग्गजों की नींद उड़ा दी है। जानिए क्या है पूरी रणनीति। 


यूपी विधानसभा चुनाव 2027: सपा के अभेद्य दुर्ग में ओवैसी की हुंकार, बदलेगा सियासी समीकरण?

उत्तर प्रदेश की सियासत में शह और मात का खेल शुरू हो चुका है। भले ही सूबे में विधानसभा चुनाव साल 2027 में होने हैं, लेकिन राजनीतिक बिसात अभी से बिछनी शुरू हो गई है। लोकसभा चुनाव के नतीजों से उत्साहित विपक्षी दल जहां अपनी जमीन को और मजबूत करने में जुटे हैं, वहीं ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के राष्ट्रीय अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने एक बड़ा दांव खेलकर उत्तर प्रदेश की राजनीति में हलचल मचा दी है। करीब डेढ़ साल के लंबे इंतजार के बाद जब ओवैसी नवाबों के शहर लखनऊ पहुंचे, तो उनके समर्थकों का उत्साह सातवें आसमान पर था। हवाई अड्डे पर गूंजते नारों के बीच ओवैसी सीधे बहराइच के लिए रवाना हो गए। लखनऊ के एक होटल में कुछ पलों के विश्राम के बाद जब उनका काफिला पूर्वांचल और अवध की ओर बढ़ा, तो सूबे के कई स्थापित सियासी सूरमाओं के माथे पर चिंता की लकीरें साफ देखी जा सकती थीं। ओवैसी का यह दौरा महज एक आम जनसभा नहीं है, बल्कि यह यूपी चुनाव 2027 के लिए उनकी पार्टी का आधिकारिक और बेहद आक्रामक चुनावी शंखनाद है। इस बार ओवैसी की नजरें उत्तर प्रदेश की करीब 200 विधानसभा सीटों पर टिकी हैं, जहां वे पूरी ताकत के साथ ताल ठोकने की तैयारी कर रहे हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों के बीच सबसे बड़ा सवाल यह तैर रहा है कि आखिर ओवैसी ने अपने इस बड़े और महत्वाकांक्षी मिशन के लिए बहराइच की मटेरा विधानसभा सीट को ही क्यों चुना? इसके पीछे बेहद गहरे रणनीतिक और सामाजिक कारण छिपे हैं। मटेरा विधानसभा क्षेत्र को पारंपरिक रूप से समाजवादी पार्टी (सपा) का एक अभेद्य गढ़ माना जाता है। आंकड़ों के आईने में देखें तो मटेरा सीट पर कुल मतदाताओं की संख्या लगभग 3.4 लाख है। इसमें से करीब 1.5 से 1.55 लाख आबादी अकेले मुस्लिम मतदाताओं की है, जो कुल वोट शेयर का लगभग 45 प्रतिशत बैठता है। इस सीट पर पिछले तीन दशकों के चुनावी मिजाज को देखें तो यहां समाजवादी पार्टी का एकछत्र राज रहा है। वर्तमान में यहां से सपा की मारिया शाह विधायक हैं, और उनसे पहले उनके पति यासर शाह भी लगातार दो बार इसी सीट से विधानसभा पहुंच चुके हैं। ओवैसी ने सीधे सपा के इसी सबसे मजबूत किले के मुख्य द्वार पर दस्तक दी है।

इसके साथ ही इस क्षेत्र का एक बड़ा ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व भी है। 11वीं शताब्दी में श्रावस्ती के राजा महाराजा सुहेलदेव और महमूद गजनवी के भांजे सैयद सालार मसूद गाजी (जिन्हें स्थानीय स्तर पर गाजी मियां कहा जाता है) के बीच एक भीषण युद्ध हुआ था। इस युद्ध में महाराजा सुहेलदेव ने सालार मसूद गाजी को परास्त किया था। बाद में बहराइच शहर में गाजी मियां की मजार बनाई गई, जिसका मटेरा और आस-पास के इलाकों में गहरा धार्मिक और सामाजिक प्रभाव है। हाल के दिनों में इस दरगाह पर लगने वाले पारंपरिक जेठ मेले और सालाना उर्स को लेकर काफी कानूनी विवाद हुआ और इस पर रोक लगा दी गई थी। मामला हाईकोर्ट तक पहुंचा और वहां से राहत मिलने के बाद ओवैसी ने अपनी चुनावी रैली से ठीक पहले इस ऐतिहासिक दरगाह पर चादरपोशी करने का फैसला किया। यह कदम सीधे तौर पर स्थानीय जनता की भावनाओं और सामाजिक ताने-बाने से खुद को जोड़ने की एक सोची-समझी कोशिश है।

AIMIM के उत्तर प्रदेश अध्यक्ष शौकत अली ने पार्टी की आगामी चुनावी रणनीति को लेकर पत्ते खोल दिए हैं। बहराइच के शंकरपुर चौराहे पर आयोजित इस विशाल रैली के माध्यम से पार्टी ने संदेश दे दिया है कि यदि भविष्य में कोई बड़ा गठबंधन नहीं होता है, तो पार्टी अकेले अपने दम पर सूबे की 200 सीटों पर प्रत्याशी उतारेगी। कयास तो यह भी लगाए जा रहे हैं कि मटेरा सीट से खुद शौकत अली चुनावी मैदान में उतर सकते हैं और ओवैसी मंच से ही उनकी उम्मीदवारी पर मुहर लगा सकते हैं। गठबंधन की संभावनाओं पर शौकत अली का कहना है कि राजनीति में विकल्प हमेशा खुले रहते हैं और उनका सबसे स्वाभाविक साथी बहुजन समाज पार्टी (बसपा) हो सकती है। गणितीय आंकड़ों के अनुसार, यदि उत्तर प्रदेश में मुस्लिम और दलित आबादी के मतों को एक साथ जोड़ दिया जाए, तो यह कुल वोट शेयर का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा बनता है। यह एक ऐसा जादुई आंकड़ा है जो सूबे की किसी भी बड़ी राजनीतिक शक्ति का समीकरण बिगाड़ने या बनाने के लिए पर्याप्त है। हालांकि, शौकत अली इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हैं कि उनकी पार्टी केवल ध्रुवीकरण की राजनीति करती है। उनका तर्क है कि वे हक और हिस्सेदारी की लड़ाई लड़ रहे हैं, न कि किसी दल को फायदा पहुंचाने के लिए मैदान में हैं।

ओवैसी के इस आक्रामक रुख से सबसे ज्यादा बेचैनी समाजवादी पार्टी के खेमे में देखी जा रही है। मटेरा से सपा के कद्दावर नेता और पूर्व विधायक यासर शाह ने इस दौरे पर तीखा तंज कसते हुए कहा है कि उत्तर प्रदेश का अल्पसंख्यक मतदाता अब बेहद जागरूक हो चुका है। उन्होंने पूर्व के राज्यों के चुनावों में AIMIM की भूमिका को करीब से देखा है। सपा नेताओं का सीधा आरोप है कि जब तक ओवैसी के कदम परोक्ष रूप से भारतीय जनता पार्टी को लाभ पहुंचाते रहेंगे, तब तक यूपी का समझदार मतदाता उनके बहकावे में आने वाला नहीं है। वहीं, सपा के राष्ट्रीय प्रवक्ताओं का कहना है कि चुनाव नजदीक आते ही गैर-भाजपा मतों, विशेषकर मुस्लिम वोटों को विभाजित करने के लिए रणनीतियां तैयार होने लगती हैं, लेकिन इस बार जनता इस खेल को पूरी तरह समझ चुकी है। सपा का दावा है कि उनके 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले के सामने विपक्षी रणनीतियां धराशायी हो जाएंगी।

यदि अतीत के चुनावी आंकड़ों पर नजर डालें तो उत्तर प्रदेश की विधानसभा में खाता खोलना ओवैसी की पार्टी के लिए हमेशा एक कठिन चुनौती रहा है। साल 2017 के विधानसभा चुनाव में AIMIM ने सूबे की 38 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन उस समय उनका खाता नहीं खुल सका और 37 सीटों पर उम्मीदवारों की जमानत तक जब्त हो गई थी। इसके बाद, साल 2022 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने अपनी रणनीति का विस्तार करते हुए मुख्य रूप से पश्चिमी उत्तर प्रदेश की 95 सीटों पर दांव लगाया। इनमें से 19 सीटों पर गैर-मुस्लिम चेहरों को भी मौका दिया गया, परंतु परिणाम उम्मीद के मुताबिक नहीं रहे और लगभग सभी सीटों पर पार्टी को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा। हालांकि, स्थानीय निकाय चुनावों में पार्टी ने जमीनी स्तर पर कुछ सफलताएं हासिल कीं, जहां उनके कई पार्षद और चेयरमैन चुनकर आए। इससे पहले ओवैसी वक्फ संशोधन बिल के सिलसिले में जनवरी 2025 में लखनऊ आए थे, लेकिन इस बार का उनका दौरा पूरी तरह से विशुद्ध राजनीतिक और चुनावी जमीन तैयार करने के मकसद से है।

दूसरी तरफ, बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि उनकी पार्टी किसी भी दल के साथ चुनावी गठबंधन नहीं करेगी। बसपा नेताओं का मानना है कि वे किसी दल विशेष के बजाय जनता के साथ सीधा गठबंधन स्थापित करेंगे, ठीक उसी तरह जैसे साल 2007 में सोशल इंजीनियरिंग के जरिए बसपा ने पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी। बसपा ने भी चुनावी रणभेरी फूंकते हुए जून के उत्तरार्ध से बड़े कार्यकर्ता सम्मेलनों की रूपरेखा तैयार कर ली है। अयोध्या, झांसी और आंबेडकर नगर जैसे महत्वपूर्ण जिलों में विशाल रैलियों के माध्यम से विधानसभा प्रभारियों की घोषणा करने की तैयारी है, जिन्हें आगामी चुनाव का वास्तविक प्रत्याशी माना जाता है। बसपा पहले चरण में करीब 100 सीटों पर उम्मीदवारों के नाम तय करने की दिशा में आगे बढ़ रही है।

AIMIM की नजरें सिर्फ बहराइच या अवध क्षेत्र तक ही सीमित नहीं हैं। पार्टी इस बार समाजवादी पार्टी के सबसे मजबूत माने जाने वाले गढ़ इटावा, भरथना और जसवंतनगर जैसी हाई-प्रोफाइल सीटों पर भी पैठ बनाने की कोशिश कर रही है। इन क्षेत्रों में ई-रिक्शा अभियानों और सघन जनसंपर्क के माध्यम से जमीनी पकड़ मजबूत की जा रही है। यह रणनीति काफी हद तक बिहार के सीमांचल क्षेत्र जैसी है, जहां मुस्लिम बहुल सीटों पर ध्यान केंद्रित करके पार्टी ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई थी। हालिया बिहार चुनाव 2025 में भी AIMIM को 5 सीटें हासिल हुई हैं, जिससे उनका हौसला बढ़ा हुआ है। अब देखना दिलचस्प होगा कि क्या ओवैसी का यह बहराइच और मटेरा कार्ड यूपी की पारंपरिक राजनीति की दिशा बदल पाएगा, या फिर इतिहास एक बार फिर खुद को दोहराएगा। इसका वास्तविक फैसला तो आने वाला वक्त और 2027 के चुनावी नतीजे ही तय करेंगे।

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