बिहार हार, कर्नाटक कलह के बाद गुजरात से कांग्रेस पर दिग्गज-पुत्र की तीखी बगावत

कांग्रेस पर एक और बड़ा झटका तब लगा जब अहमद पटेल के बेटे फैसल पटेल ने बिहार हार और कर्नाटक कलह के बीच गुजरात से खुली बगावत कर दी। उन्होंने नेतृत्व पर तीखे आरोप लगाते हुए नई पार्टी बनाने के संकेत दिए, जिससे कांग्रेस में संभावित टूट की आशंका गहरा गई।




बिहार हार, कर्नाटक कलह के बाद गुजरात से कांग्रेस पर दिग्गज-पुत्र की तीखी बगावत

ग्लोबल हिंदी न्यूज़ नेटवर्क

गुजरात की राजनीति से उठी एक आवाज़ ने कांग्रेस के पूरे ढांचे को झकझोर दिया है। बिहार चुनाव में करारी हार के बाद, जब पार्टी पहले ही सदमे और मनोबल के भारी गिरावट से गुजर रही थी, कर्नाटक में जारी गुटबाजी ने स्थितियों को और कठिन बना दिया। इसी बीच अहमद पटेल के बेटे फैसल पटेल के बगावती तेवर ने कांग्रेस नेतृत्व की नींदें उड़ा दी हैं। यह सिर्फ एक नाराज़ युवा नेता की प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि उस अन्दरूनी असंतोष का उजागर रूप है, जो वर्षों से चुपचाप उबलता रहा और अब फटकर सामने आ गया है।फैसल पटेल ने सोशल मीडिया पर साफ शब्दों में कांग्रेस से अलग होने की इच्छा जताई। उन्होंने कहा कि वे ‘कांग्रेस (AP)’ नाम से एक नया राजनीतिक समूह बनाने पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं। यह घोषणा ऐसे समय में आई है, जब कांग्रेस बिहार में 243 में से सिर्फ 6 सीटों तक सिमट गई, और कर्नाटक में मंत्री बनाम संगठन की तकरार ने सरकार तक को खतरे में डाल दिया है। इन दो प्रदेशों के झटके के बाद तीसरा झटका गुजरात से मिलना पार्टी के लिए बेहद चिंताजनक है।

अहमद पटेल, जो सोनिया गांधी के सबसे भरोसेमंद सलाहकार और संगठन के प्रमुख रणनीतिकार थे, उनके बेटे द्वारा पार्टी नेतृत्व पर खुलेआम सवाल उठाना कांग्रेस के उस भरोसे को सीधा झटका है, जिसे वह वर्षों से परिवार के प्रति निष्ठा की नींव पर खड़ा मानती थी। फैसल पटेल ने राहुल गांधी और प्रियंका गांधी को ‘लॉस्ट गांधीज़’ बताते हुए कहा कि उनका नेतृत्व पिछले कई सालों से पार्टी को लगातार कमजोर कर रहा है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कांग्रेस का वर्तमान नेतृत्व अब पुराने ढर्रे पर काम करने का आदी हो चुका है, जहाँ ‘आउट-ऑफ़-कंट्रोल सलाहकारों’ का दबदबा है और अनुभवी नेताओं को हाशिये पर धकेल दिया जाता है।उनकी यह टिप्पणी कहीं न कहीं यह संकेत देती है कि कांग्रेस के भीतर ऐसी आवाज़ें अब सिर्फ हल्के विरोध तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि अब वे पार्टी में संभावित विभाजन के स्तर तक पहुँच चुकी हैं। फैसल ने यह भी कहा कि कांग्रेस को शशि थरूर जैसे नेताओं को नेतृत्व सौंप देना चाहिए, जो अनुभव और क्षमता में “25 गुना बेहतर” हैं। इस बयान ने कांग्रेस के अंदर उस पुरानी बहस को फिर जगा दिया है कि क्या गांधी परिवार अब भी पार्टी को एकजुट रखने में सक्षम है या अब नेतृत्व नए हाथों को सौंपने का समय आ गया है।

फैसल पटेल की बहन मुमताज़ पटेल, जो पिछले कुछ सालों में अलग राजनीतिक पहचान बनाने में लगी रही हैं, ने भाई की घोषणा से तुरंत दूरी बना ली। उन्होंने स्पष्ट कहा कि उनका किसी नए संगठन से जुड़ने का कोई इरादा नहीं है और फैसल की राय पूरी तरह निजी है। यह बयान साफ दर्शाता है कि फैसल की बगावत अचानक परिवार आधारित नहीं, बल्कि पूरी तरह व्यक्तिगत राजनीतिक सोच का परिणाम है।पिछले एक वर्ष में फैसल पटेल ने लगातार कांग्रेस नेतृत्व की आलोचना की है। उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था कि पार्टी में ‘ग्रुप कल्चर’ और सलाहकारों का ऐसा प्रभाव हो गया है कि ईमानदार और अनुभवी नेता धीरे-धीरे दूर होते जा रहे हैं। यह आरोप वे पहली बार नहीं लगा रहे थे। इससे पहले भी वे कई बार राहुल गांधी की राजनीतिक शैली पर सवाल उठा चुके हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, अमित शाह और डॉ. एस. जयशंकर की खुलकर तारीफ करते हुए कहा था कि “देश सुरक्षित हाथों में है”। यह टिप्पणी अपने आप में कांग्रेस के लिए बड़े राजनीतिक संदेश लेकर आई थी क्योंकि यह पहला मौका था जब कांग्रेस के किसी बड़े परिवार से जुड़ा व्यक्ति खुले मंच से भाजपा नेतृत्व की प्रशंसा करता दिखा।

इन बयानों की श्रृंखला को जोड़कर देखा जाए तो साफ लगता है कि फैसल पटेल लंबे समय से कांग्रेस नेतृत्व के तौर-तरीकों से नाराज़ थे। लेकिन बिहार की हार और पार्टी की गिरती स्थिति ने उनकी नाराज़गी को सार्वजनिक विद्रोह में बदल दिया। बिहार में महागठबंधन की उम्मीदों के बावजूद कांग्रेस का 6 सीटों तक सीमित रह जाना, न सिर्फ चुनावी हार बल्कि नेतृत्व की असफलताओं का प्रतीक बन गया है। इसी दौरान कर्नाटक में मंत्री पद को लेकर भयंकर आन्तरिक कलह सामने आई, जिसने कांग्रेस की सरकार और संगठन दोनों को अस्थिर कर दिया।इन हालातों ने कांग्रेस की रणनीति, नेतृत्व और भविष्य पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं। इस कमजोर स्थिति के बीच फैसल पटेल का यह बयान पार्टी के भीतर नई फूट की आशंका को और मजबूत करता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि कांग्रेस का संगठनात्मक ढांचा इन दिनों इतना कमजोर हो चुका है कि एक छोटी सी बगावत भी बड़े टूट का रूप ले सकती है, जैसा 1969 में हुआ था।

कांग्रेस हमेशा से खुद को एक ऐसी पार्टी मानती रही है, जहाँ असहमति भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा होती है, लेकिन वर्तमान समय में असहमति अब विद्रोह की सीमा तक पहुंच चुकी है। बिहार की शिकस्त, कर्नाटक में कलह और गुजरात से उठी यह बगावती आवाज़ये तीनों संकेत साफ तौर पर बताते हैं कि संगठन का दबाव बढ़ चुका है और नेतृत्व में बदलाव की मांग अब सिर्फ आलोचना नहीं, बल्कि परिणामों का रूप ले रही है।सियासी पंडित मानते हैं कि कांग्रेस को इस समय सबसे ज्यादा जरूरत है संगठनात्मक पुनर्गठन और भरोसा वापस पाने की। अगर फैसल पटेल जैसे नेता, जो एक ऐसे परिवार से आते हैं जिसने वर्षों तक कांग्रेस को जीवित रखा, अब पार्टी से अलग होने की बात कर रहे हैं, तो यह संकेत है कि पार्टी अपने सबसे मजबूत सामाजिक और राजनीतिक स्तंभों को भी खोती जा रही है।

कांग्रेस का भविष्य अब इस पर निर्भर करेगा कि नेतृत्व इस बगावत को कैसे समझता है क्या इसे एक नाराज़ युवा की आवाज़ मानकर दबा देगा, या इसे पार्टी में संपूर्ण सुधार के लिए चेतावनी के रूप में लेगा। जो भी हो, इस समय कांग्रेस ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहाँ एक गलत कदम उसे और कमजोर कर सकता है फैसल पटेल के इस विद्रोह ने इतना तय कर दिया है कि कांग्रेस को अब निर्णायक कदम उठाने होंगे। समय रहते अगर पार्टी ने अपने संगठन, नेतृत्व और रणनीति पर ठोस और साहसिक निर्णय नहीं लिए, तो आने वाले दिनों में यह बगावत सिर्फ एक आवाज़ नहीं रहेगी, बल्कि उस बड़ी टूट की शुरुआत बन सकती है, जिससे उभरना कांग्रेस के लिए बहुत मुश्किल होगा।

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