हार के बाद कांग्रेस का आत्मनिर्णय, बिहार में खुद को फिर से खड़ा करने की मुहिम

बिहार चुनाव में करारी हार के बाद कांग्रेस ने आत्मविश्लेषण कर अपनी रणनीति बदल दी है। पार्टी ने अब आरजेडी के प्रभाव से बाहर निकलकर हर विधानसभा क्षेत्र में खुद को खड़ा करने का फैसला लिया है। संगठनात्मक मजबूती, अनुशासन और स्वतंत्र राजनीतिक पहचान को फिर से स्थापित करने के लिए कांग्रेस नई मुहिम शुरू कर रही है।

 

हार के बाद कांग्रेस का आत्मनिर्णय, बिहार में खुद को फिर से खड़ा करने की मुहिम

ग्लोबल हिंदी न्यूज़ नेटवर्क

बिहार विधानसभा चुनाव में मिली ताजा हार ने कांग्रेस को ऐसी राह पर ला खड़ा किया है जहां अब पीछे मुड़कर देखना उसके लिए विकल्प नहीं रहा। 61 सीटों में से सिर्फ 6 पर जीत और बाकी सभी पर निराशाजनक प्रदर्शन ने पार्टी को यह अहसास करा दिया कि अगर वह राज्य की राजनीति में दोबारा गंभीर दावेदार के रूप में उभरना चाहती है तो उसे दूसरों के सहारे की आदत से छुटकारा पाना होगा। देशभर में लगातार कमजोर होती चुनावी पकड़ और बिहार जैसे राजनीतिक रूप से निर्णायक राज्य में पिछड़ते जनाधार ने कांग्रेस नेतृत्व को यह समझने पर मजबूर कर दिया है कि संगठन को नए सिरे से खड़ा किए बिना किसी गठबंधन की छतरी भी उसकी असली कमजोरी को नहीं छिपा सकती। इसी कारण दिल्ली में हुई हालिया समीक्षा बैठक के बाद पार्टी नेतृत्व ने राज्य इकाई को साफ संदेश दे दिया कि अब 243 विधानसभा और 40 लोकसभा सीटों पर कांग्रेस को खुद अपने पैरों पर मजबूती से खड़ा होना होगा, चाहे इसका राजनीतिक जोखिम कितना ही बड़ा क्यों न हो।

इस फैसले की पृष्ठभूमि में कई महत्वपूर्ण बिंदु छिपे हैं। चुनाव नतीजों के बाद स्थानीय नेताओं से मिले फीडबैक में यह बात सामने आई कि कई जगहों पर कांग्रेस का बूथ-स्तर का ढांचा लगभग निष्क्रिय था। कार्यकर्ता चुनाव से कुछ दिन पहले ही सक्रिय दिखे, लेकिन पूरे पांच साल का काम जनता से जुड़ाव के लिए पर्याप्त नहीं था। कई जिलों में मतदाता यह मानकर चल रहे थे कि कांग्रेस सिर्फ गठबंधन का एक हिस्सा भर है और उसके अलग से राजनीतिक अस्तित्व पर भरोसा नहीं किया जा रहा था। इस सोच के पीछे पिछले दो दशकों में पार्टी की रणनीति भी जिम्मेदार रही, जहां उसने आरजेडी के प्रभाव वाले इलाकों में अपनी गतिविधियों को सीमित रखा ताकि गठबंधन में तालमेल बना रहे। लेकिन इस बार पार्टी उम्मीदवारों ने खुलकर आलाकमान को बताया कि इस नीति ने संगठन की रीढ़ को कमजोर किया है, क्योंकि जिन इलाकों में कांग्रेस सबसे ज्यादा कमजोर है, वहीं वह सबसे ज्यादा दूसरों पर निर्भर रहती है।नतीजे में यह स्थिति पैदा हुई कि कांग्रेस को सीटें तो कम मिलीं, लेकिन उससे भी बड़ी चोट यह थी कि वह राजनीतिक प्रभाव में पहले से और सिकुड़ गई। यही वजह है कि पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने बिना किसी नाम लिए सीधे संकेत दिया कि आगे की लड़ाई कांग्रेस को अपनी शर्तों पर लड़नी होगी। अब राज्य में न तो किसी क्षेत्र को ‘दूसरे दल का इलाका’ माना जाएगा, न ही संगठनात्मक विस्तार को गठबंधन की राजनीति के हिसाब से सीमित किया जाएगा। यह फैसला हालांकि देर से आया है, लेकिन कांग्रेस के लिए बिहार में यह सबसे बड़ा रणनीतिक मोड़ माना जा रहा है।

दिल्ली में हुई बैठक के दौरान राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे ने बिहार कांग्रेस अध्यक्ष राजेश राम और कोर टीम से विस्तार से बातचीत की। बैठक में पार्टी अनुशासन, स्थानीय इकाइयों की निष्क्रियता और कार्यकर्ताओं में बढ़ती ढिलाई को लेकर खास नाराजगी जताई गई। हालांकि हार के बाद भी राज्य अध्यक्ष पर कार्रवाई न करने का निर्णय लिया गया, लेकिन यह साफ कर दिया गया कि संगठनात्मक सुस्ती अब किसी कीमत पर बर्दाश्त नहीं होगी। जिला और प्रखंड स्तर पर कई पदाधिकारियों को बदला जाएगा, और ऐसे नेताओं को भी नोटिस भेजे जाएंगे जिन्होंने चुनाव के दौरान पार्टी लाइन से हटकर बयान दिए या अनुशासनहीन व्यवहार किया। यह पहली बार है जब कांग्रेस ने इतनी सख्ती से बिहार इकाई को संकेत दिया है कि भविष्य का रास्ता सिर्फ मेहनत, जवाबदेही और सक्रियता से ही तय होगा।चुनाव विश्लेषण में यह भी सामने आया कि कांग्रेस ने महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, शराबबंदी के दुष्प्रभाव और शिक्षा-स्वास्थ्य जैसे प्रमुख मुद्दों पर मजबूत कैंपेन तैयार नहीं किया। कई इलाकों में मुकाबला त्रिकोणीय हो गया, लेकिन कांग्रेस के उम्मीदवार बिना जमीन तैयार किए मैदान में कूद गए। इसके विपरीत बीजेपी और जेडीयू ने बूथ स्तर पर महीनों पहले से तैयारी शुरू कर दी थी। आरजेडी का भी कोर वोट बैंक बरकरार दिखा, लेकिन कांग्रेस को वह ट्रांसफर उतना प्रभावी नहीं मिला जितनी उम्मीद थी। इसके अलावा चुनाव से पहले गठबंधन के भीतर बयानबाजी, सीट बंटवारे पर मतभेद और कुछ जगहों पर ‘दोस्ताना मुकाबले’ ने भी कांग्रेस की स्थिति कमजोर की।

पार्टी की अब नई रणनीति यह है कि डेढ़ से दो साल का सतत अभियान चलाकर बिहार के हर जिले में संगठन की नई संरचना बनाई जाए। युवा कांग्रेस, महिला कांग्रेस, एससी-एसटी और अल्पसंख्यक विभागों को पुनर्गठित करने की योजना तैयार की जा रही है। बूथ अध्यक्षों का नया पैनल बनेगा और हर विधानसभा में कम से कम 50 ऐसे कार्यकर्ताओं को चिन्हित किया जाएगा जो चुनावी साल के अलावा भी जनता से जुड़े रहें। इसके अलावा हर जिले में 50 दिनों का विशेष जनसंपर्क कार्यक्रम चलाया जाएगा, जिसमें पार्टी नेता लोगों से सीधे बात करेंगे और स्थानीय मुद्दों का डेटा तैयार करके उसे चुनावी रणनीति का हिस्सा बनाएंगे। यह मॉडल यूपी और कर्नाटक में पार्टी द्वारा अपनाए गए ढांचे पर आधारित होगा, जिसमें लंबे समय की संगठनात्मक मजबूती को ही जीत की सबसे बड़ी कुंजी माना जाता है।हालांकि इस नई नीति की अपनी चुनौतियाँ भी हैं। बिहार में जाति-आधारित राजनीति हमेशा से निर्णायक कारक रही है, और कांग्रेस के पास अब न तो कोई ठोस जातीय आधार है और न ही कोई लोकप्रिय चेहरा जो व्यापक समाज को जोड़ सके। पार्टी को न सिर्फ संगठन मजबूत करना है बल्कि अपना सामाजिक समीकरण भी दोबारा बनाना होगा। कांग्रेस के पास पहले यादव, मुसलमान, दलित और सवर्ण हर वर्ग में एक संतुलित उपस्थिति रहती थी, लेकिन अब अधिकांश हिस्से टूटकर दूसरे दलों के साथ चले गए हैं। पार्टी के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह दोबारा ऐसा भरोसा कैसे बनाए जो न सिर्फ वोट दिला सके बल्कि कार्यकर्ता को भी प्रेरित कर सके।

बिहार की राजनीति में कांग्रेस का स्वर्णकाल अब इतिहास का हिस्सा बन चुका है, लेकिन इस इतिहास को वर्तमान में बदलने की कोशिश अब उसके सामने सबसे कठिन परीक्षा है। पार्टी का यह फैसला कि वह अगले चुनाव में ‘सहयोगी नहीं, प्रतिस्पर्धी’ की भूमिका में उतरेगी, राज्य की राजनीति के समीकरणों को बदल सकता है। अगर कांग्रेस सच में हर सीट पर मजबूत उम्मीदवार, सक्रिय कैडर और साफ राजनीतिक संदेश लेकर उतरती है, तो वह कई क्षेत्रों में मुकाबला त्रिकोणीय बना सकती है, जिसका फायदा उसे भविष्य में मिल सकता है। लेकिन अगर यह घोषणा सिर्फ एक बैठक की प्रतिक्रिया बनकर रह गई, तो पार्टी का जनाधार और सिकुड़ सकता है। बहरहाल, कांग्रेस के लिए यह सिर्फ बिहार का चुनावी नुकसान नहीं, बल्कि उसकी संगठनात्मक क्षमता और राजनीतिक आत्मविश्वास की सबसे बड़ी परीक्षा है। आने वाले महीनों में यह दिखेगा कि उसकी नई रणनीति सिर्फ कागज़ी आश्वासन है या वास्तव में एक ऐसी मुहिम जो पार्टी को फिर से जमीन से जोड़ सके। बिहार जैसे राज्य में, जहां राजनीति लगातार बदलती है और मतदाता सिर्फ वादों से नहीं बल्कि संपर्क और भरोसे से प्रभावित होते हैं, कांग्रेस के लिए यह दौड़ कठिन जरूर है, लेकिन असंभव नहीं। इसके लिए उसे उसी धरातल पर लौटना होगा, जहां से कभी उसका सफर शुरू हुआ था जनता के बीच, उनके मुद्दों के साथ और अपनी पहचान पर अडिग रहकर। यही वह राह है जो कांग्रेस को फिर से प्रासंगिकता दिला सकती है और शायद अगली बार वह हार नहीं, नई संभावना के साथ मैदान में लौटे।


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