उत्तर प्रदेश की बदलती सियासत में कानून व्यवस्था, बुलडोजर नीति, माफिया-विरोधी कार्रवाई और ध्रुवीकरण चुनाव 2027 का मुख्य आधार बनते दिख रहे हैं। योगी सरकार अपनी सख्त छवि को मजबूत कर रही है, जबकि विपक्ष रोजगार और सामाजिक न्याय को मुद्दा बना रहा है। यही संघर्ष चुनावी माहौल को और तीखा बना रहा है।
उत्तर प्रदेश की बदलती सियासत में कानून व्यवस्था, बुलडोजर नीति और ध्रुवीकरण का बढ़ता प्रभाव
उत्तर प्रदेश की राजनीति एक बार फिर उस मोड़ पर खड़ी है जहां सत्ता और विपक्ष दोनों अपने-अपने एजेंडों को धार देने में जुटे हैं। विधानसभा चुनाव 2027 में अभी लगभग डेढ़ साल का समय शेष है, लेकिन राजनीतिक तापमान आज ही चुनावी माहौल जैसा दिखने लगा है। सत्ताधारी पक्ष अपने दस वर्षों के कार्यकाल में हुए परिवर्तन, बड़े फैसले और उठाए गए साहसिक कदमों को गिनाने में व्यस्त है, जबकि विपक्ष बेरोजगारी, सामाजिक न्याय, आरक्षण और जातीय समीकरणों के सहारे मंच मजबूत करने में लगा हुआ है। इस पूरी बहस के केंद्र में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की कानून व्यवस्था की नीति और वह बुलडोजर अभियान है जिसने पिछले आठ वर्षों में प्रदेश की राजनीति को एक नई दिशा देने का काम किया है। राज्य सरकार मानती है कि अपराध, माफिया नेटवर्क और दंगाइयों की संपत्तियों पर सख्त कार्रवाई ने प्रदेश को एक सुरक्षित वातावरण देने में मदद की है, वहीं विपक्ष का आरोप है कि यह नीति चुनिंदा लोगों को निशाना बनाती है और इसमें न्यायिक प्रक्रिया कमजोर पड़ती है। लेकिन जनमानस की स्वीकार्यता में इस नीति की लोकप्रियता ने इसे सरकार का सबसे मजबूत हथियार बना दिया है।
पिछले वर्षों में प्रदेश में कई बड़े मामलों ने कानून व्यवस्था को राष्ट्रीय विमर्श का विषय बनाया। संगठित अपराध से जुड़े कई कुख्यात नामों पर कार्रवाई हुई, प्रदेश में अपराधियों, माफिया और बाहुबली नेटवर्क पर दबाव बढ़ा, और ध्वस्तीकरण की नीति के माध्यम से सरकार ने संदेश दिया कि प्रदेश में गैरकानूनी कब्जे या अपराध से अर्जित संपत्ति को किसी भी हाल में संरक्षण नहीं मिलेगा। आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2017 से 2024 के बीच अवैध कब्जों और अपराधियों की संपत्तियों पर हजारों करोड़ रुपये मूल्य की कार्रवाई हुई, जबकि हजारों अपराधियों के खिलाफ गैंगस्टर एक्ट, एनएसए जैसी कठोर धाराओं में केस दर्ज हुए। सरकार का दावा है कि इन कार्रवाइयों से अपराध में ठोस गिरावट आई और प्रदेश ने कानून व्यवस्था के क्षेत्र में पिछले शासन की तुलना में अधिक स्थिर माहौल बनाया है। विभिन्न जिलों में अपराध नियंत्रण से जुड़े डेटा भी इसी ओर संकेत करते हैं कि हत्या, फिरौती, अपहरण और संगठित अपराध से जुड़े मामलों में सुधार दर्ज किया गया है। सरकार इस सुधार को अपने जीरो टॉलरेंस मॉडल की उपलब्धि के रूप में पेश कर रही है।
प्रदेश की राजनीति में कानून व्यवस्था के समानांतर ध्रुवीकरण का तत्व भी गहराई से जुड़ता जा रहा है। धार्मिक आयोजनों, जुलूसों, सार्वजनिक स्थलों पर पालन होने वाले नियमों और सामुदायिक व्यवहार को लेकर पिछले समय में कई बार तीखी बहसें सामने आईं। मुख्यमंत्री के हालिया बयानों में भी कानून व्यवस्था के साथ कठोर संदेश स्पष्ट दिखाई देता है, जिसमें उन्होंने दंगाइयों, उपद्रवियों और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वालों के खिलाफ सख्त रुख जारी रखने की बात कही है। उनकी यह नीति न सिर्फ भाजपा का कोर राजनीतिक संदेश बन चुकी है बल्कि यह समर्थकों को एक निर्णायक और मजबूत नेतृत्व की छवि भी देती है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि प्रदेश की बड़ी आबादी के बीच कानून व्यवस्था एक बड़ा चुनावी मुद्दा बन चुका है और वर्तमान सरकार इसे अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि के रूप में सामने रखने में सफल रही है।
विपक्ष की रणनीति इससे बिलकुल भिन्न है। वह लगातार रोजगार, शिक्षा, जातीय जनगणना, सामाजिक न्याय और महंगाई जैसे मुद्दों को उभार रहा है। प्रदेश में बेरोजगारी दर भले ही पिछले वर्षों में कुछ उतार-चढ़ाव के बीच रही हो, लेकिन विपक्ष इसे एक प्रमुख मुद्दा बनाने में जुटा है। कई क्षेत्रों में युवाओं के लिए रोजगार के अवसरों की कमी, प्रतियोगी परीक्षाओं की प्रक्रियाओं में आई रुकावटें और सरकारी नौकरियों में चयन की गति विपक्ष की राजनीति का केंद्र हैं। जातीय समीकरणों की दृष्टि से भी पिछड़े वर्गों, दलितों, अल्पसंख्यकों और युवाओं को साथ लाने की कवायद तेज होती दिखाई दे रही है। विपक्ष का मानना है कि वर्तमान सरकार की नीतियों से समाज का एक वर्ग असंतुष्ट है और उसकी आवाज उठाना आवश्यक है।
लेकिन उत्तर प्रदेश की राजनीति सिर्फ वाद-विवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मनोविज्ञान की राजनीति भी है। सरकार की कठोर कार्रवाई की छवि उस वर्ग में लोकप्रिय है जो कानून व्यवस्था को प्राथमिक मुद्दा मानता है। ध्वस्तीकरण की प्रतीकात्मक छवि, अपराधियों के डर का संदेश, और विभिन्न मंचों पर दिए गए कड़े बयानों ने योगी आदित्यनाथ की छवि को एक निर्णायक और अडिग प्रशासक के रूप में स्थापित किया है। उनके समर्थक इसे प्रदेश की बदलती छवि का प्रमाण बताते हैं। उनका दावा है कि 2017 से पहले की तुलना में आज प्रदेश में भयमुक्त वातावरण है और यह निवेश, पर्यटन, बुनियादी ढांचे और युवाओं के अवसरों के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है। वहीं विपक्ष का कहना है कि भयमुक्ति के नाम पर मनमाने ढंग से की गई कार्रवाई, गैरकानूनी ढंग से ढहाई गई संपत्तियां और पुलिस कार्रवाई से जुड़े विवादित मामले भी गहरी चिंता का विषय हैं।
सियासत में पाकिस्तान, आतंकवाद, धार्मिक कट्टरता और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दे भी लगातार उभरते रहे हैं। यह तत्व भाजपा की राष्ट्रवादी राजनीति का एक हिस्सा हैं जो चुनावी दौर में और अधिक मुखर हो जाते हैं। हालिया घटनाओं में बड़े सुरक्षा अभियानों, सीमा पार चुनौतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा के संदेशों ने इस विमर्श को और गहरा किया है। भाजपा समर्थक इस नीति को मजबूती से समर्थन देते हैं, जबकि विपक्ष इसे वास्तविक मुद्दों से ध्यान भटकाने वाली राजनीति मानता है। चुनावी रणनीति के रूप में यह विमर्श अत्यंत प्रभावी साबित होता है क्योंकि यह भावनाओं, सुरक्षा, राष्ट्रवाद और पहचान जैसे संवेदनशील तत्वों को सीधे प्रभावित करता है।
परिस्थितियाँ बताती हैं कि उत्तर प्रदेश का अगला चुनाव कानून व्यवस्था, रोजगार, सामाजिक संतुलन, धार्मिक ध्रुवीकरण और विकास की परस्पर टकराती कहानियों का चुनाव होगा। सत्ता पक्ष अपनी उपलब्धियों, सख्त कार्रवाई और मजबूत नेतृत्व के संदेश के सहारे मैदान में उतर रहा है। दूसरी ओर, विपक्ष सामाजिक न्याय, युवाओं की आकांक्षाओं और आर्थिक चुनौतियों को केंद्र में रखकर नई रणनीति तैयार कर रहा है। लेकिन एक तथ्य निर्विवाद है कि इस बार का चुनाव पिछले सभी चुनावों से अधिक टकरावपूर्ण और विचारधारात्मक होगा। जनता किस दिशा में फैसला देगी, यह आने वाले महीनों में और स्पष्ट होगा, परंतु इतना निश्चित है कि 2027 का चुनाव सिर्फ सत्ता का परिवर्तन नहीं होगा, बल्कि यह प्रदेश की नई दिशा और पहचान तय करने वाला चुनाव साबित होगा।
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