बिहार विधानसभा जीत के बाद भाजपा ने पश्चिम बंगाल को अगला बड़ा लक्ष्य बनाया है। बदलते राजनीतिक भूगोल, मुस्लिम मतदाताओं की भूमिका, SIR विवाद और टीएमसी की मजबूत जमीनी पकड़ के बीच भाजपा नई रणनीति के साथ मैदान में उतर रही है। 2026 का चुनाव राज्य की राजनीति दिशा तय करेगा।
बिहार की जीत के बाद भाजपा का बंगाल अभियान और राजनीति का बदलता भूगोल
बिहार विधानसभा चुनाव ने भाजपा को जितनी मजबूती दी, उतनी ही राजनीतिक अपेक्षा भी बढ़ा दी है। पार्टी अब अपनी अगली निर्णायक लड़ाई पश्चिम बंगाल में लड़ने जा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं घोषणा की कि भाजपा की अगली बड़ी लड़ाई बंगाल की होगी। लेकिन बिहार और बंगाल की परिस्थिति कितनी भिन्न है, यह बात भाजपा के रणनीतिकार अच्छी तरह समझते हैं। बिहार में जातिगत समीकरण और विकास का मुद्दा चुनाव की धुरी होते हैं, जबकि बंगाल में राजनीतिक वफादारियां सांस्कृतिक पहचान, ऐतिहासिक स्मृति और सामाजिक संरचना से गहराई से जुड़ी होती हैं। यही कारण है कि भाजपा ने बंगाल के लिए अपनी रणनीति को नए सिरे से तैयार किया है। चुनावी भाषा बदली है, मुद्दों की प्राथमिकता बदली है और मतदाताओं तक पहुंचने की प्रक्रिया भी।2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने बंगाल में 42 में से 18 सीटें जीतकर राज्य की राजनीति को हिला दिया था। 40.25% वोट शेयर के साथ पार्टी पहली बार सत्ता के करीब दिखाई दी थी। विश्लेषकों ने इसे बंगाल में भाजपा के उभार की शुरुआत कहा। लेकिन 2021 के विधानसभा चुनाव ने यह स्पष्ट कर दिया कि 2019 की लहर स्थायी नहीं थी। भाजपा को 27.81% वोट और 77 सीटें मिलीं 2016 की तुलना में यह अभूतपूर्व वृद्धि थी, पर सत्ता से अब भी बहुत दूर। 2024 के लोकसभा चुनाव में भी पार्टी की सीटें घटकर 12 रह गईं। वोट प्रतिशत 39.10% पर टिके रहने के बावजूद यह साफ था कि बंगाल में भाजपा का विस्तार उतना सरल नहीं जितना उसने बिहार में अनुभव किया था।
बंगाल की राजनीतिक संरचना में मुस्लिम आबादी का प्रभाव बहुत बड़ा है। राज्य की लगभग 27–30% आबादी मुस्लिम है और करीब 60–65 सीटों पर इस समुदाय का निर्णायक असर पड़ता है। यही कारण है कि भाजपा ने इस बार अपनी भाषा और संदेश दोनों को बदल दिया है। पार्टी अब यह कह रही है कि वह “राष्ट्रवादी मुसलमानों के खिलाफ नहीं है।” यह वाक्य पहली बार भाजपा के आधिकारिक बयानों में सुनाई दे रहा है। विपक्ष के नेता सुवेंदु अधिकारी तक, जिन्हें भाजपा का सबसे आक्रामक चेहरा माना जाता है, यह कह रहे हैं कि भाजपा सिर्फ घुसपैठ और फर्जी वोटरों के खिलाफ है, किसी समुदाय के नहीं। यह राजनीतिक संदेश केवल बयान नहीं, बल्कि रणनीति का हिस्सा है।भाजपा की यह रणनीति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि बंगाल के मुस्लिम मतदाता एकरूप नहीं हैं। कुछ जिलों जैसे मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर दिनाजपुर में मुस्लिम मतदाता अत्यधिक प्रभावी हैं, जबकि हावड़ा, हुगली, दक्षिण 24 परगना और उत्तर 24 परगना में इनकी संख्या निर्णायक तो नहीं, पर चुनावी नतीजों को प्रभावित करने में सक्षम है। भाजपा को पिछले चुनावों में इन क्षेत्रों में भारी नुकसान हुआ। पार्टी के भीतर यह समझ बनी कि यदि मुस्लिम मतों का 5–7% भी भाजपा की ओर झुकता है, तो 20 से अधिक सीटों पर नतीजे बदल सकते हैं। इसलिए भाजपा अब इस समुदाय के भीतर संवाद का रास्ता खोलना चाहती है। राजनीतिक हिंसा में मुस्लिम समुदाय को हुए नुकसान की बात बार-बार उठाना इसी रणनीति का हिस्सा है।
बंगाल में चल रही SIR (मतदाता सूची सत्यापन) प्रक्रिया को भी भाजपा सावधानी से उठा रही है। बिहार में भाजपा ने इस प्रक्रिया को “घुसपैठ रोकने” के नैरेटिव से जोड़कर चुनावी लाभ लिया था। पर बंगाल में मामला संवेदनशील है। यहाँ टीएमसी का आरोप है कि भाजपा इसे मुस्लिम मतदाताओं को डराने का तरीका बनाना चाहती है। भाजपा ने इस आरोप को कमजोर करने के लिए “राष्ट्रवादी मुस्लिम” शब्द का इस्तेमाल शुरू किया है, ताकि वह अवैध घुसपैठ और स्थानीय मुस्लिम मतदाताओं के बीच स्पष्ट रेखा खींच सके। यह राजनीतिक भाषा बदलना भाजपा की सबसे बड़ी रणनीतिक चाल है।लेकिन भाजपा केवल भाषा नहीं बदल रही, जमीन भी बदल रही है। पार्टी ने राज्य को पाँच बड़े हिस्सों में बाँटकर हर क्षेत्र में अलग रणनीति तैयार की है। उत्तर बंगाल में अलग पहचान और विकास का मुद्दा प्रमुख है, जहाँ लंबे समय से पहाड़ी और मैदानी इलाकों में असंतोष है। दक्षिण बंगाल में उद्योग, रोजगार और प्रशासनिक जवाबदेही जैसे मुद्दों को प्राथमिकता दी जा रही है। कोलकाता और उसके आसपास के क्षेत्रों में भ्रष्टाचार, शहरी अव्यवस्था और कानून-व्यवस्था को मुख्य चुनावी विषय बनाया जा रहा है।
राजनीतिक संगठन के स्तर पर भी भाजपा इस बार पहले से कहीं अधिक सक्रिय है। दूसरे राज्यों के वरिष्ठ नेताओं को बंगाल में महीनों तैनात किया गया है। बूथ-स्तर पर कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित किया जा रहा है। भाजपा समझती है कि बंगाल में टीएमसी के मुकाबले खड़े होने के लिए सिर्फ नारों या रैलियों से काम नहीं चलेगा उसके लिए मजबूत बूथ नेटवर्क और विश्वसनीय स्थानीय चेहरे चाहिए। यही काम पार्टी अब तेजी से कर रही है।बंगाल की राजनीति में हिंसा लंबे समय से एक दुखद हकीकत रही है। भाजपा इस मुद्दे को लगातार उठा रही है कि राजनीतिक हिंसा में सिर्फ भाजपा कार्यकर्ता ही नहीं, कई मुस्लिम परिवार भी प्रभावित हुए। भाजपा इस तर्क के माध्यम से यह संदेश देना चाहती है कि हिंसा का सबसे ज्यादा नुकसान उसी समुदाय को उठाना पड़ता है, जिसे टीएमसी अपना वोट आधार कहती है। यह भाजपा की रणनीति का वह हिस्सा है जिसे विपक्ष “छिपा हुआ ध्रुवीकरण” कह रहा है लेकिन राजनीतिक दृष्टि से यह भाजपा के लिए प्रभावी साबित हो सकता है।भाजपा के लिए सबसे महत्वपूर्ण चुनौती है बंगाल की सांस्कृतिक राजनीति। बंगाल में राजनीति केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान का प्रश्न भी है। ममता बनर्जी ने अपने शासनकाल में “बंग्लार मेये” यानी “बंगाल की बेटी” का नैरेटिव स्थापित किया है, जो आज भी ग्रामीण और शहरी दोनों इलाकों में प्रभावी है। भाजपा को यह समझ आ गया है कि बंगाल की राजनीति में भावनाओं और भाषा का प्रभाव उत्तर भारत से कहीं अधिक गहरा है। इसलिए भाजपा अब अपने अभियान में बंगाली भाषा, बंगाली राजनीतिक प्रतीकों और स्थानीय संस्कृति को स्थान दे रही है।
2026 का चुनाव भाजपा के लिए केवल सत्ता का सवाल नहीं, बल्कि बंगाल में अपनी दीर्घकालिक उपस्थिति का भी प्रश्न है। बिहार में जीत से पार्टी को जो गति मिली है, उसे बंगाल में दोहराना आसान नहीं। लेकिन पार्टी ने इस बार पहले से अधिक गंभीरता, अधिक अध्ययन और अधिक सावधानी दिखाई है। यह बदलाव केवल चुनाव जीतने की रणनीति नहीं, बल्कि बंगाल की राजनीतिक जमीन को समझने का प्रयास भी है बहरहाल, 2026 का चुनाव बंगाल की राजनीति में नया अध्याय लिख सकता है। यह लड़ाई केवल भाजपा बनाम टीएमसी नहीं, बल्कि दो राजनीतिक संस्कृतियों का मुकाबला भी होगी। भाजपा को सत्ता चाहिए, लेकिन उससे भी अधिक उसे बंगाल की स्वीकृति चाहिए और यही वह चुनौती है, जो अगले चुनाव को रोचक, जटिल और ऐतिहासिक बना सकती है।
0 टिप्पणियाँ