ओबीसी फोकस के साथ भाजपा का बड़ा संगठनात्मक पुनर्गठन, 2026-27 चुनावी तैयारी तेज

उत्तर प्रदेश में भाजपा ने ओबीसी नेतृत्व पर फोकस करते हुए बड़े संगठनात्मक फेरबदल को तेज किया है। 84 जिलाध्यक्षों की नियुक्ति के बाद पार्टी अब नए प्रदेश अध्यक्ष की तैयारी में है। यह पूरा पुनर्गठन 2026 के पंचायत चुनाव और 2027 के विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए रणनीतिक रूप से आगे बढ़ाया जा रहा है।



ओबीसी फोकस के साथ भाजपा का बड़ा संगठनात्मक पुनर्गठन, 2026-27 चुनावी तैयारी तेज

उत्तर प्रदेश में भाजपा संगठन में लंबे समय से चल रही हलचल अब निर्णायक मोड़ पर पहुँच चुकी है। पार्टी ने 84 जिलों में जिलाध्यक्षों की नियुक्ति कर दी है और अब केवल 14 संगठनात्मक जिले ऐसे रह गए हैं जहाँ नई तैनाती होनी बाकी है। यह प्रक्रिया केवल पद भरने का काम नहीं है, बल्कि भाजपा की उस गहरी रणनीति का हिस्सा है जिसके केंद्र में आगामी 2026 के पंचायत चुनाव और 2027 के विधानसभा चुनाव हैं। निवर्तमान प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह चौधरी का कार्यकाल जनवरी 2024 में समाप्त हो गया था, यानी लगभग दो साल से प्रदेश भाजपा बिना स्थायी अध्यक्ष के चल रही है, और यही कारण है कि अब संगठनात्मक ढाँचे को अंतिम रूप दिए जाने की प्रक्रिया तेज कर दी गई है। पिछले दो वर्षों के भीतर भाजपा ने लगातार यह महसूस किया है कि संगठन को मजबूत किए बिना राजनीतिक लड़ाई नहीं जीती जा सकती। यही वजह है कि जिलाध्यक्षों की नियुक्तियों में भी पार्टी ने परंपरागत पैटर्न से हटकर जातीय और क्षेत्रीय संतुलन को प्राथमिकता देते हुए कदम बढ़ाए हैं। हाल ही में घोषित 14 जिलाध्यक्षों में 7 ओबीसी, 6 सामान्य और 1 दलित वर्ग को स्थान दिया गया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि पार्टी का पूरा फोकस ओबीसी वोट बैंक को साधने पर है, जो कि लगभग 52 प्रतिशत आबादी के आधार पर यूपी की राजनीति का निर्णायक तत्व है।

भाजपा के लिए यह समीकरण इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को उम्मीद के मुकाबले कम सीटें मिलीं और ओबीसी वर्ग के एक हिस्से में सपा के पीडीए मॉडल ने अपनी पकड़ बढ़ाई। भाजपा नेतृत्व अच्छी तरह समझता है कि यदि संगठनात्मक ढाँचा कमजोर रहा या जातीय प्रतिनिधित्व कमजोर दिखा तो 2027 की लड़ाई कठिन हो सकती है। इसलिए 84 जिलाध्यक्षों में 32 ओबीसी नेताओं को जगह देकर पार्टी ने यह संकेत दिया है कि वह सामाजिक आधार को संतुलित कर रही है और उसे अपने पारंपरिक वोट बैंक के साथ-साथ उन वर्गों का भी भरोसा जीतना है, जो पिछले चुनाव में खिसकते दिखाई दिए थे। यही कारण है कि नए प्रदेश अध्यक्ष के लिए भी ओबीसी नेताओं के नाम सबसे आगे चल रहे हैं। शीर्ष दावेदारों में धर्मपाल सिंह, बीएल वर्मा, रामशंकर कठेरिया, विद्यासागर सोनकर, दिनेश शर्मा, हरीश द्विवेदी और गोविंद नारायण शुक्ला जैसे नाम चर्चा में हैं। इनमें से धर्मपाल सिंह और बीएल वर्मा दो ऐसे चेहरे हैं जिनकी जातीय पृष्ठभूमि और संगठनात्मक सक्रियता भाजपा के भविष्य के समीकरण में फिट बैठती है। वहीं दलित और ब्राह्मण नेतृत्व को भी पार्टी नजरअंदाज नहीं करना चाहती, इसलिए रामशंकर कठेरिया और दिनेश शर्मा को भी मजबूत दावेदारों में गिना जा रहा है। भाजपा की रणनीति स्पष्ट है कि प्रदेश अध्यक्ष का चेहरा ऐसा हो जो जातिगत रूप से प्रभावी हो, संगठन को ऊर्जा दे सके और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ सहज तालमेल कर सके।

इन नियुक्तियों का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि भाजपा अब जिला स्तर पर पुराने और नए चेहरों के संतुलन को भी साधने की कोशिश कर रही है। कुछ जिलाध्यक्षों को दोबारा नियुक्त करके पार्टी ने यह संदेश दिया है कि जो नेता संगठनात्मक रूप से जमीन पर मजबूत थे, उन्हें हटाने का कोई इरादा नहीं है। वहीं कुछ जिलों में विवादों में घिरे नेताओं को हटाकर पार्टी ने यह भी दिखाया है कि अनुशासन और राजनीतिक ईमानदारी उसके लिए उतनी ही महत्वपूर्ण है जितना जातिगत संतुलन। फतेहपुर में जिलाध्यक्ष को हटाना इसी सोच का हिस्सा रहा। यह साफ है कि भाजपा की प्राथमिकता अब उस विस्तृत नेटवर्क को तैयार करना है जो बूथ और सेक्टर स्तर पर पार्टी को 2026 और 2027 के चुनावों में निर्णायक बढ़त दे सके।

प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति को लेकर एक और दिलचस्प चर्चा संगठन में चल रही है खरमास का विषय। पार्टी के कई वरिष्ठ नेता चाहते हैं कि 16 दिसंबर से शुरू होने वाले खरमास से पहले नया प्रदेश अध्यक्ष तय हो जाए ताकि अशुभ माने जाने वाले समय में कोई बड़ा संगठनात्मक निर्णय न लेना पड़े। पंचायत चुनावों की तैयारी को देखते हुए यह सुझाव गलत भी नहीं है, क्योंकि नए अध्यक्ष को पूरे राज्य में पदयात्रा, संगठनात्मक दौरे, समीक्षा बैठकें और रणनीति निर्माण जैसे बड़े काम तुरंत संभालने होंगे। यदि नियुक्ति खरमास के बाद होती है, तो नए अध्यक्ष के पास चुनावी मशीनरी को गति देने के लिए कम समय बचेगा। भाजपा 2024 में मिले झटके के बाद अब कोई जोखिम उठाना नहीं चाहती, इसलिए संगठनात्मक प्रक्रियाओं को तेज करने पर जोर दिया जा रहा है।

पिछले दस वर्षों के भीतर भाजपा की यूपी राजनीति को यदि देखें तो भाजपा ने हमेशा सामाजिक इंजीनियरिंग के सहारे अपने आधार को बढ़ाया है। 2014 से लेकर 2019 और फिर 2022 के विधानसभा चुनावों तक भाजपा का सबसे बड़ा हथियार यही समीकरण रहा सवर्ण नेतृत्व के साथ गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलितों का मज़बूत गठजोड़। लेकिन 2024 के चुनाव ने यह संकेत भी दिया कि यह फार्मूला स्थायी नहीं है और इसे लगातार अपडेट और मजबूत करना होगा। यही कारण है कि भाजपा अब फिर उसी सामाजिक आधार को सशक्त करने की दिशा में आगे बढ़ रही है जिसे उसने एक दशक तक सबसे बड़ा राजनीतिक हथियार बनाया था। वहीं, सपा का PDA मॉडल भाजपा के लिए नए सिरे से चुनौती बना है, इसलिए पार्टी अब जातीय प्रतिनिधित्व को केवल चुनावी घोषणा की तरह नहीं बल्कि संगठनात्मक नियुक्तियों के जरिए जमीन पर उतारने की कोशिश कर रही है। भाजपा समझती है कि पंचायत चुनाव सीधे-सीधे विधानसभा चुनावों का संकेतक होते हैं, इसलिए इन पर कोई भी कोताही या प्रयोग चुनावी परिणामों को प्रभावित कर सकता है।

नए जिलाध्यक्षों की नियुक्तियों से एक और बात स्पष्ट होती है कि भाजपा बूथ-स्तर संरचना को मजबूत करने की तैयारी में है। बूथ और सेक्टर संयोजकों की टीम पूरी तरह जिलाध्यक्षों के संपर्क में रहती है, और जिलाध्यक्ष ही वह नेतृत्व है जो सीधे मैदान में उतरकर संगठन को सक्रिय रखता है। इस लिहाज से जिलाध्यक्षों की नियुक्तियाँ केवल औपचारिक नहीं बल्कि राजनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। यही वह नेतृत्व है जो पंचायत चुनावों के दौरान ग्रामीण स्तर पर भाजपा का चेहरा बनेगा और विधानसभा चुनावों में स्थानीय समीकरणों को साधने में मदद करेगा। भाजपा की रणनीति यह है कि हर जिले में एक ऐसा जिलाध्यक्ष नियुक्त किया जाए जो स्थानीय जातीय स्थिति को समझता हो और संगठन के प्रति सक्रिय और जवाबदेह हो।

अब यह साफ दिख रहा है कि भाजपा उत्तर प्रदेश में 2026 और 2027 के लिए बेहद गंभीरता से तैयारी कर रही है। जिलाध्यक्षों की यह श्रृंखला उसकी सामाजिक सोच, संगठनात्मक पैटर्न और चुनावी दृष्टि को स्पष्ट करती है। अब बस प्रदेश अध्यक्ष की घोषणा बाकी है, और जैसे ही यह नियुक्ति होगी, प्रदेश में भाजपा की चुनावी रणनीति और स्पष्ट हो जाएगी। भाजपा जिस तेजी के साथ संगठन को पुनर्गठित कर रही है, उससे यह संकेत मिलता है कि पार्टी 2024 की गलतियों को दोहराना नहीं चाहती। अब मुकाबला केवल सीटों या वोट प्रतिशत का नहीं बल्कि पूरे सामाजिक जनाधार को पुनर्गठित करने का है। भाजपा की यह कोशिश सफल होती है या नहीं, इसका पहला संकेत 2026 के पंचायत चुनावों से मिल जाएगा और असली तस्वीर 2027 में बनेगी। लेकिन अभी के लिए इतना तय है कि भाजपा ने अपने संगठन को फिर से मजबूत करने के लिए सबसे बड़ा दांव खेल दिया है।


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