सुप्रीम कोर्ट में न्यायिक बदलाव का नया दौर अब तारीख के बोझ से मुक्ति की ओर

सुप्रीम कोर्ट में CJI सूर्यकांत ने ऐतिहासिक सुधार लागू किए। अब तारीख पर तारीख नहीं मिलेगी, मौखिक मेंशनिंग सीमित होगी और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामलों की स्वतः लिस्टिंग दो वर्किंग-डे में होगी। बेल, अग्रिम जमानत व तात्कालिक मामलों की सुनवाई तेजी से सुनिश्चित की जाएगी।



सुप्रीम कोर्ट में न्यायिक बदलाव का नया दौर अब तारीख के बोझ से मुक्ति की ओर

ग्लोबल हिंदी न्यूज़ नेटवर्क

सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया के रूप में कार्यभार संभालते ही सीजेआई सूर्यकांत ने जो कदम उठाए हैं, उन्हें भारतीय न्याय व्यवस्था में लंबे समय से ज़रूरी सुधारों की दिशा में सबसे बड़ा प्रयास माना जा रहा है। वर्षों से अदालतों में “तारीख पर तारीख” का बोझ केवल एक मुहावरा नहीं था, बल्कि लाखों लोगों की न्याय तक पहुंच को धीमा करने वाली वास्तविकता थी। देश की सर्वोच्च अदालत में मेंशनिंग, लिस्टिंग, बेल, अग्रिम जमानत और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में अनावश्यक देरी लगातार चिंता का विषय रही है। इसी पृष्ठभूमि में 1 दिसंबर से लागू होने वाले नए नियमों ने न्यायिक कामकाज का पूरा ढांचा ही बदल दिया है और अब सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई की प्रक्रिया पारदर्शी, समयबद्ध और जवाबदेह होती दिखाई दे रही है। सीजेआई सूर्यकांत ने चार महत्वपूर्ण सर्कुलर जारी किए, जिनके प्रभाव से सुप्रीम कोर्ट में प्रशासन और केस प्रबंधन की शैली पूरी तरह रीडिज़ाइन हो गई है। इन सर्कुलरों का सबसे बड़ा असर मौखिक मेंशनिंग पर पड़ा है, जो लंबे समय से भीड़, मनमानी और अव्यवस्था की वजह बनती थी। अब किसी भी सीनियर एडवोकेट को मौखिक मेंशनिंग की अनुमति नहीं होगी और केवल वे ही मामले मेंशन हो पाएंगे, जो एक दिन पहले जारी की गई ‘मेंशनिंग लिस्ट’ में शामिल हों। 

इसका सीधा लाभ यह होगा कि कोर्ट परिसर में रोज़ होने वाली दर्जनों अनियंत्रित मेंशनिंग, जो कई बार सुनवाई के समय को बाधित करती थीं, अब लगभग समाप्त हो जाएंगी। अदालत ने यह भी तय कर दिया है कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े जरूरी मामलों की स्वत: लिस्टिंग दो वर्किंग-डे के भीतर होगी, जिसके लिए अब किसी तरह की मेंशनिंग की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। इससे बेल, अग्रिम जमानत, हैबियस कॉर्पस, डेथ पेनल्टी, तत्काल बेदखली या ध्वस्तीकरण रोकने जैसे मामलों को बिना देरी के सीधा सूचीबद्ध किया जाएगा। इन मामलों में देरी अक्सर किसी नागरिक की स्वतंत्रता पर सीधा असर डालती थी और कई बार लोग महीनों तक सुनवाई का इंतजार करते थे। नए नियमों के साथ सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि न्याय की प्रक्रिया अब तेज, संवेदनशील और मानवाधिकारों के प्रति अधिक सजग होगी। अदालत का ध्यान यह सुनिश्चित करने पर है कि कोई भी व्यक्ति मात्र तकनीकी देरी के कारण अपनी आजादी का नुकसान न झेले। समाज में न्याय का सबसे मजबूत आधार व्यक्तिगत स्वतंत्रता ही मानी जाती है और इस रफ्तार से यह आधार और मजबूत होगा।

स्वत: लिस्टिंग से जहां तात्कालिक मामलों को राहत मिलेगी, वहीं गैर-स्वचालित मामलों के लिए भी एक सख्त लेकिन सुव्यवस्थित रास्ता तय कर दिया गया है। अब वकीलों को दोपहर 3 बजे तक निर्धारित प्रोफॉर्मा के साथ अर्जेंसी लेटर जमा करना होगा, ताकि सामान्य मामलों की लिस्टिंग में भी पारदर्शिता बनी रहे। शनिवार को यह सीमा 11:30 बजे तक होगी, जबकि अत्यधिक जरूरी मामलों में दस्तावेज सुबह 10:30 बजे तक स्वीकार किए जा सकते हैं। लेकिन इसके लिए अर्जेंसी लेटर में यह सिद्ध करना आवश्यक होगा कि मामला सामान्य प्रक्रिया का इंतजार नहीं कर सकता। यह कदम उन मामलों में अनुशासन लाएगा, जो अक्सर “तत्काल” बताकर बार-बार कोर्ट के समय को प्रभावित करते थे।न्यायिक प्रक्रियाओं को सुधारने का एक और बड़ा क्षेत्र स्थगन रहा है। अदालत में स्थगन की संस्कृति कई बार सुनवाई को अनिश्चित काल तक टाल देती थी। अब सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि स्थगन केवल विरोधी पक्ष की पूर्व-सहमति से और केवल तीन परिस्थितियों में ही दिया जाएगा शोक, गंभीर स्वास्थ्य कारण या वास्तव में बेहद जरूरी स्थितियाँ। ऑनलाइन तय फॉर्मेट में आवेदन आवश्यक होगा और पहले लिए गए स्थगनों का विवरण देना अनिवार्य होगा। इससे मामलों में अनावश्यक देरी और सुनवाई के टालने की प्रथा पर रोक लगेगी।

बेल से जुड़ी प्रक्रिया में भी बड़ा सुधार किया गया है। जैसे ही कोई जमानत याचिका रजिस्टर होती है, एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड को तुरंत संबंधित राज्य या केंद्र सरकार के स्टैंडिंग काउंसल को ‘एडवांस कॉपी’ भेजनी होगी। बिना ‘प्रूफ ऑफ सर्विस’ जमा किए याचिका न तो वेरीफाई होगी, न ही लिस्ट। इससे सरकार की ओर से प्रतिनिधित्व तय होगा और अदालत को बार-बार नोटिस देने या जवाब न आने की वजह से सुनवाई टलने जैसी समस्याओं से छुटकारा मिलेगा। आँकड़े बताते हैं कि सुप्रीम कोर्ट में हर वर्ष हजारों बेल अपीलें लंबित रह जाती हैं, क्योंकि तकनीकी खामियों के कारण वे समय पर लिस्ट नहीं होतीं। यह सुधार सीधे उस देरी को खत्म करेगा।साल दर साल सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों की संख्या 80 हजार से ऊपर बनी रहती है, जिसमें लगभग 25 से 30 प्रतिशत मामले व्यक्तिगत आजादी से जुड़े होते हैं। ऐसे में स्वत: लिस्टिंग व्यवस्था इन आंकड़ों को कम करने में एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगी। नई प्रक्रिया में बेंच समय और अदालत के संसाधनों का इस्तेमाल अधिक प्रभावी तरीके से होगा, जिससे सुनवाई और निर्णय दोनों तेज होने की उम्मीद है।

इन सुधारों का असर केवल न्यायिक प्रक्रिया पर नहीं पड़ेगा, बल्कि वकील समुदाय की कार्यशैली पर भी इसका असर गहरा होगा। अब जूनियर वकीलों को मेंशनिंग का अवसर मिलेगा, जिससे उन्हें कोर्ट प्रैक्टिस में अधिक सक्रियता और अनुभव प्राप्त होगा। वहीं सीनियर एडवोकेट्स द्वारा की जाने वाली अनियंत्रित मेंशनिंग समाप्त होगी, जिससे अदालत का वातावरण अधिक संतुलित रहेगा।इन सुधारों के साथ सुप्रीम कोर्ट यह संदेश दे रहा है कि न्याय व्यवस्था को समयानुकूल ढालना ही न्याय की विश्वसनीयता और प्रभावशीलता को मजबूत बनाता है। सीजेआई सूर्यकांत का यह कदम भारतीय न्यायिक इतिहास में एक बड़े प्रशासनिक सुधार के रूप में याद किया जाएगा। आने वाले महीनों में अदालत की कार्यशैली और समय-सीमा में होने वाले वास्तविक बदलावों को देखकर इन सुधारों की सफलता का मूल्यांकन किया जा सकेगा, लेकिन इतना स्पष्ट है कि न्याय की दिशा अब अधिक सरल, तेज और व्यवस्थित हो रही है। न्याय तक पहुंच को आसान बनाना, देरी की परंपरा को तोड़ना और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सर्वोपरि रखना यही इस बदलाव की असली शक्ति है और यही सुप्रीम कोर्ट को आधुनिक न्यायिक प्रणाली की ओर ले जाने वाला कदम भी है।

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